गुरुवार, 5 सितंबर 2013

Add Me - Add Me

अक्सर डिस्कवरी देखता हूँ तो पाता हूँ कि पशु-पक्षी समाज में स्त्री जाति की प्रधानता होती है। उन लोगों के यहाँ हमारे तरह पुरुषप्रधान समाज नहीं हुआ करते। वैसे हमारे यहाँ भी "पुरुषप्रधान" तो सिर्फ़ कहने को ही है, वास्तविकता से सामना तो शादी के बाद ही होता है कि प्रधान पुरुष है या स्त्री। ;) परंतु शादी से पहले तो सामान्यतः पुरुष ही प्रधान होता है। अगर नहीं है तो भगवान उस दीन प्राणी की आत्मा शान्त रखे! ;)

हाँ, तो मैं पशु-पक्षियों की बात कर रहा था। उनके समाज में स्त्रियों की प्रधानता का अन्दाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उनमें जीवनसाथी का चुनाव भी मादा ही करती है। यही नहीं, मकड़ी की कुछ प्रजातियों में तो मादा समागम के बाद अपने नर साथी को खा भी लेती हैं। क्यों डर गये ना! और नर मादा को रिझाने के लिये ना जाने क्या-क्या किया करते हैं। कोई नर अपने सतरगी पंखों को फ़ैला कर नाच दिखाता है, तो कोई तरह-तरह की आवाजें निकालता है। कोई तरह-तरह के शृंगार करता है तो कोई अपने प्रतिद्वंदी को हराता है।

घड़ियाल मादा को पाने के लिए अपने प्रतिद्वंदी से घमासान युद्ध करता है, जो प्राय: घंटों चलता है। वहीं, हाथी को प्रेमिका से प्रणय की स्वीकृति प्राप्त करने में हफ्तों या महीनों लग जाते हैं। इस अवधि में हाथी हथिनी का साथ कभी नहीं छोड़ता। कभी बढ़िया खाद्य पदार्थ खोजकर उसे देता है, उसके स्नान में सहायक बनता है, तो कभी विश्राम के लिए आरामदेह स्थान खोजने में उसकी मदद करता है। पक्षी भी अपने संगीत, सुंदर पंखों या अपनी योग्यता का प्रदर्शन करके अपनी प्रेयसी से प्रणय की भीख मांगते हैं। जिन पक्षियों को अपने सुंदर पंखों पर गर्व होता है, वे घंटों तक अपने परों को फुला-फुलाकर संवारते हैं। फिर मादा के सामने पहुंचकर नाचते हैं। इसके बाद हाव-भाव, नृत्य और मनुहारों का क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि मादा रीझ नहीं जाती। गाने वाले पक्षी पेड़ की डाल पर बैठकर जोर-जोर से गाते हैं। इन दिनों उनके गले में एक साज और स्वर में एक अजीब मधुरता आ जाती है और वे दिन-रात प्रणय गीत गाते रहते हैं। जिन पक्षियों को गाना नहीं आता है, वे केवल गले से आवाज करते हैं, जोर-जोर से बोलते हैं। कबूतर अपनी प्रियतमा को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए गुटरगूं का राग अलापता हुआ उसके चारों ओर घूम-घूमकर नाचता है और प्रणय याचना करता है। नर पपीहा भी अनेक हाव-भाव से मादा का चित्त हरने की कोशिश करता है। नर पहले मादा के पास आकर इस तरह से बैठ जाता है, मानो प्यार की भीख मांग रहा हो। फिर मधुर स्वर में अपना प्रणय गीत आरंभ करता है। नर बया भी वर्षा काल आरंभ होने पर बहुत ही कलापूर्ण और अपनी प्रेयसी की रुचि के अनुकूल घोंसला बनाता है और जब मादा उसका निरीक्षण करके उसे 'पास' कर देती है, तो समझिए उसने नर का प्रणय प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। नर नीलकंठ मादा को खुश करने के लिए उसके  आगे अपने करतब दिखाता हुआ पहले तो ऊपर उड़ जाता है, फिर नीचे की ओर ऐसे गिरता है मानो मर गया हो। पर जमीन पर आने से पहले ही व संभलकर फिर ऊपर उड़ जाता है। इस प्रकार यह मादा को खुश करके जोड़ा बना लेता है।

अब आप पूछेंगे कि ये सब मैं आपको क्यों बता रहा हूँ, क्यों मैं यहाँ पर डिस्कवरी छाँट रहा हूँ? ख़ैर, आप पूछिये, उससे पहले मैं ही बताये देता हूँ। दरअसल क्या है कि, अक्सर मैं डिस्कवरी पर ही नहीं फेसबुक पर भी ऐसे ही "नर" टाईप इन्सान को देखता हूँ जो बड़े-बड़े पेजेज के पोस्ट्स पर "Add Me - Add Me" का राग अलाप कर "मादाओं" को पटाने की कोशिश करते हैं। ;) और माशाअल्लाह! अपने कमेंट को सजाते तो ऐसे हैं कि मानो कोई मोरनी, हिरणी, कुतिया, बन्दरिया इत्यादि हों, जिनको ये आसानी से पटाकर ही दम मारेंगे। ;) इस "प्रणय-भिक्षा" में बस एक "कटोरे" की कमी खलती है मुझे। बाबा जुकेरबर्ग को चाहिये कि इन बेचारे "नरों" को शीघ्र-अतिशीघ्र एक "ऑनलाइन तथा वर्चुअल" कटोरा प्रदान करें। ;)

धन्यवाद!

खी... खी... खी...

- सुमित सुमन

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

आतंकवादी नहीं "हास्यवादी"

मुझे नहीं पता कि तब के जमाने में बच्चे गब्बर का नाम सुनकर कैसा रिएक्ट करते थे, पर इन आतंकवादियों के नाम सुनकर आज के जमाने में बच्चे हँसते जरूर हैं। ;)

जरा गौर कीजिये, "टुँडा"… या "भटकल"। यार कैसा नाम हुआ ये भला। एक तो मानो लगता है कि कोई सब्जी का नाम हो - भिंडा। जब पहली बार इसका नाम सुना तो दस मिनट तक खीखीयाना रोक ही ना सका। नाम ही ऐसा है।  और "भटकल"… ये तो किसी भी एंगल से आतंकवादी का नाम लगता ही नहीं है। "उदास", "अकेला", "अलबेला", "अनजाना", "बैरागी", "भटकल"; प्रायः शायरों के नाम में ऐसे टाइटल हुआ करते हैं। ऐसे टाइटलों के लगे होने से कोई "टुच्चे" शायर भी हों तो वो "बड़े साहित्यकार" प्रतीत होते हैं। परंतु कोई "टुच्चा" जो अपने आप को आतंकवादी कहता हो तथा अपने नाम ऐसे हास्यास्पद रखता हो तो मुझे नहीं लगता कि उससे कोई डरेगा भी। "आँख का अँधा, नाम नयनसुख" वाली कहावत ऐसे ही लोगों के लिये लिखी गयी है शायद। जो आतंक पैदा करे वो हुआ आतंकवादी, परन्तु जो हास्य पैदा कर दे वो काहे का आतंकवादी! "हास्यवादी" कहो भाई।

इतिहास में पढ़ा था। पुराने जमाने में भी दहशतगर्द हुआ करते थे, मसलन "चँगेज़ ख़ाँ"। नाम सुनकर ही कितनों की धोती गीली हो जाती होगी। वहीं, एक था "मुहम्मद गोरी"… मुझे नहीं लगता कि इसके नाम से कोई ख़ौफ़ खाता होगा। मेरी तो हँसी छूट जाती है। ये भी कोई नाम हुआ… "गोरी"। इससे ज्यादा डरावने तो आज-कल की गोरियों के होते हैं, जिनके नाम सुनते ही बेचारे पतिदेव के पसीने छूटने लगते हैं। ;)

अब भैय्या, कहलाते हैं आतंकवादी तो नाम से भी तो लगना चाहिये ना कि अमुक आदमी "आतंकवादी" है। माना कि अब "चँगेज़ ख़ाँ" और "तुर्रम ख़ाँ" टाइप नाम फ़ैशन में नहीं रहे, आउटडेटेड हो चुके हैं। या ये भी मान सकता हूँ कि ये आतंकवादियों की कोई नयी रणनीति हो ताक़ि इन्टरपोल की आँखों में धूल झोंका जा सके। शायद वो सोचते होंगे कि इस्लाम तो वैसे ही बदनाम है विदेशी एयरपोर्टों पर, ऐसे में अगर नाम भी "ख़तरनाक़" टाइप रख लिये तो भविष्य में ना तो कोई "टावर" उखाड़ पायेंगे ना ही "कुछ" और उखाड़ पायेंगे। परन्तु ऐसी भी क्या नामों की किल्लत हो गयी है आतंकवादी समाज में!

मेरी तो उन हास्यवादियों को यही राय है कि भैय्या भूतकाल के "मुहम्मद गोरी" अथवा "गोलमाल" के "बबली भाई" से प्रेरित होकर अपने नाम मत रखा करो। नाम ऐसे रखो कि सुन कर ही दहशत पैदा हो जाये दिल में। धोती ना सही, पर पैन्ट तो जरूर गीली-पीली हो जाये लोगों की। मेरा कर्तव्य था, सो आपको सलाह दे दिया। आगे आपकी मर्ज़ी।
 चलता हूँ, राम-राम!!!

- सुमित सुमन

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

तुलसीदास जी के दोहे की भ्रामकता

महाकवि तुलसीदास
"सूर सूर, तुलसी शशि, उड़ुगन केशवदास…"
साहित्य-आकाश के 'चन्द्रमा' तुलसीदास को वर्तमान पीढी ने जितना गलत समझा है, उतना शायद उनके समकालीन किसी कवि को नहीं समझा गया।

तुलसी के एक दोहे का गाहे-बगाहे लोग अज्ञानतावश गलत सन्दर्भ में प्रयोग करते रहते हैं -

"ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥"

ख़ेद के साथ कहना चाहुँगा कि तुलसी के इस एक दोहे को गलत सन्दर्भ में उधृत करने वाले अधिकाँश लोगों को इनका कोई अन्य दोहा याद भी होगा, इसमें भी संशय होता है मुझे। और अगर पढा भी होगा तो शायद ठीक से समझा नहीं। मेरे इस आलेख का मक़सद तुलसी के इसी दोहे की भ्रामकता को दूर करना है।

दोस्तों, तुलसी एक महाकवि हैं, और "महाकवि" की उपाधी उन्होंने अपने साहित्य की गुणवत्ता के ज़रिये अर्जित की है, उन्हें किसी ने भीख में ये उपाधी नहीं दी है।

सन्दर्भ में जानक़ारी देना चाहुँगा कि साहित्य की दो मुख्य विधायें हैं- गद्य और पद्य। गद्य जहाँ अपने विस्तार के लिये जाना जाता है, वहीं पद्य अपने अलँकार के लिये। पद्य में अलँकारों और उपमाओं की बहुलता होती है, जिनका अपना गूढ अर्थ होता है। इन्हें समझने के लिये विस्तृत दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। महज़ सतही आकलन से इन रचनाओं की सार्थकता समझ में नहीं आती।

गद्य यानी कहानियाँ, फ़िल्मों के पोस्टर और अन्य चित्रों की तरह होती हैं, जिन्हें कोई भी समझ सकता है; जबकि पद्य यानी काव्य मौडर्न-आर्ट की तरह हैं, जिन्हें समझने के लिये दृष्टिकोण का विस्तार चाहिये। कथ्य की इसी जटिलता के कारण ही सम्भवतः कहानियों के रसिया ज्यादा मिलते हैं, किन्तु काव्य में रुचि रखने वाले कम।

सन्दर्भ में शुरुआत मैं "ढोल" से करना चाहुँगा। संगीत में दो अहम चीज़ें होती हैं- सुर और ताल। जब तबले का प्रचलन नहीं था, तब ताल देने के लिये ढोल का प्रयोग किया जाता था। ताल अगर बिगड़ जाती है तो सुर भी बिगड़ जाता है और संगीत का सत्यानाश हो जाता है। तो ढोलक की ताल को सही बनाये रखने के लिये उसमें लगे रस्से और छल्लों की मदद से उसे "कसा" जाता है, अनुशासित किया जाता है। इसी "कसने" और "अनुशासित करने" की प्रक्रिया को तुलसी ने "ताड़न" कहा है। अज्ञानतावश हम तुलसी के "ताड़न"को मारना-पीटना और प्रताड़ित करना समझ लेते हैं।

प्रसंग में आचार्य चाणक्य के एक श्लोक को रखना चाहुँगा-

"लालयेत् पञ्चवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्, प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्!"

- चाणक्य नीति


(Indulge a child for the first 5 years; discipline him for the next 10; when he attains the age of 16, treat him like a friend.)

यहाँ चाणक्य के कथन का ये अर्थ कदापि नहीं है कि 10 वर्ष तक पुत्र को हर वक़्त मारते-पीटते रहें! बल्कि वो उसे अनुशासित करने, उसे "कसने" पर ज़ोर देते हैं, क्योंकि ये वो अवस्था है जब बालक कच्ची मिट्टी का होता है। इस समय जैसे संस्कारों का उसमें बीजारोपण होगा, वह पूरे जीवन रहेगा।

तो दोस्तों, तुलसी के "ताड़न" को भी इसी सन्दर्भ में देखने की जरूरत है। अब ज़रा इस नये सन्दर्भ के आलोक में तुलसी के कथन को फ़िर से देखिये।

"ढोल" को अनुशासित करेंगे, तो संगीत की सुन्दरता बढेगी। "गँवार" को अनुशासित बनायेंगे, तो समाज़ की सुन्दरता बढेगी। "शूद्र" को अनुशासित और विकसित बनायेंगे, तो वो समाज़ की मुख्य-धारा में शामिल हो पायेंगे और राष्ट्र विकसित होगा। "पशु-धन" को अनुशासित और विकसित बनायेंगे, तो कृषि और आजीविका का विकास होगा। "स्त्री" अनुशासित होगी, तो परिवार सुसंस्कृत और विकसित होगा।

यही कारण है कि ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी को अनुशासित करने की आवश्यकता है। समाज़ को इतना महान सूत्र देने वाले तुलसी के इस कथन को ठीक उलटा अर्थ दे दिया गया है!

मत भूलें कि जिस तुलसी के नायक "राम" हैं, वह इतनी निम्न सोच कैसे रख सकते हैं! वह राम, जिनका जन्म ही "सद-रक्षणाय, खल-निग्रहणाय" हुआ… वह राम, जिन्होंने शबरी के जूठे बेर खा कर जाति-प्रथा पर कठोर प्रहार किया… वह राम, जिनके सबसे प्रिय हनुमान एक वानर थे!

मत भूलें कि रामबोला को तुलसी उनकी पत्नी ने बनाया… एक स्त्री ने।

"लाज न लागत आपको, दौरे आयहु साथ। धिक-धिक ऐसे प्रेम को कहाँ कहहुं मे नाथ॥

अस्थि चर्ममय देह मम, तामे ऐसी प्रीती। तैसी जो श्रीराम मे, छेती न तो भव भीती॥"


लेकिन अफ़सोस! जो पीढी राम को ही ना समझ सकी, जो पीढी रावण में अपना नायक देखती है; वह पीढी अगर तुलसी को ना समझ सकी तो आश्चर्य कैसा!

सन्दर्भ में और कहना चाहुँगा। जाति-पाती के प्रश्न पर तुलसी ने चिढ कर "कवितावली" में अपने अन्दर का आक्रोश इन पँक्तियों में व्यक्त किया है :-

"धूत कहौ अवधूत कहौ रजपूत कहौ जोलहा कहौ कोऊ काहू की बेटी सों बेटा न व्याहब, काहू की जाति बिगारी न सोऊ।''

पुन:,

"मेरे जाति-पांति न चहौं काहू का जाति-पांति, मेरे कोऊ काम को न मैं काहू के काम को।''
रावण में अपना नायक देखती है; वह पीढी अगर तुलसी को ना समझ सकी तो आश्चर्य कैसा!

-
विश्वास आनंद

सोमवार, 19 अगस्त 2013

गंगा की आत्म-व्यथा

मैं,
गंगा!!!

वही गंगा, जिसे आप देवनदी कहते हैं, देवी मानते हैं, "माँ" कह कर पुकारते हैं, जो आपके अनुसार भागीरथ के तपस्या से प्रसन्न ब्रह्मा के वरदान-स्वरूप उनके कमण्डल से निकली, विष्णु के चरणों को स्पर्श करते हुए रूद्र की जटाओं में भी स्थान पाया और पृथ्वी पर आकर 60,000 सागर-पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया।

पर छोड़िये भी, मैं भी क्या आप-लोगों के समक्ष भूली-बिसरी यादों को पुनः संजोने लगी। क्या करूँ, थोड़ी बावरी जो हूँ!!! सही सुना, बावरी ही हूँ; या यूँ कहें की बावरी हो गयी हूँ।

जिस देश को मैंने उसकी सभ्यता-संस्कृति और परम्पराएं दीं, जहाँ की आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक आस्था का आधार रही हूँ, जहाँ की सारी स्मृतियाँ, आशाएँ, ज्ञान-विज्ञान पराजय की पीड़ा और ऐसी ही ना जाने कितनी चीज़ें मुझसे लिपटी हैं; उसी देश में, उन्ही आज मुझे भुला दिया है, मुझे तिरस्कृत कर दिया है, वह भी अपने ही घर में...

ओह! ये क्या कहा मैंने अभी?
"अपना घर...!!!"

सच-मुच बावरी ही हो गयी हूँ।
सच है की इस देश में नारियों की उनके ससुराल में होने वाली क़द्र और पूछ सिर्फ चार दिनों की चाँदनी ही होती है, फिर उन्हें मिलता है तो सिर्फ तिरस्कार, दमन और शोषण ही... और इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं।

ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हो रहा है। क्या करूँ! जाती से "औरत" जो हूँ... सहना तो पड़ेगा ही। पर कब तक सहूँ... और सहूँ भी तो किसके लिए?

मैंने वह समय भी देखा है जब मेरे भागीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए, उनके द्वारा किये गए प्रण को स्वीकारते हुए मुझे पृथ्वी पर अवतरित कराने के लिए ऐसी घोर तपस्या की, जिसे उनके प्रयास के लिए आप लोगों को "भागीरथ-प्रयास" का नाम देना पड़ा।

और एक समय मैं वर्तमान का भी देख रही हूँ, जब उसी भागीरथ के वंशजों ने उस प्रण और प्रयास को धूमिल कर दिया है।

पर अब सब व्यर्थ है। बहुत रुष्ट हूँ मैं इस देश से और यहाँ के वासियों से भी। अब और नहीं रहूँगी यहाँ। कोई कारण ही नहीं बचा है। ना तो भागीरथ हैं, और ना ही उन जैसे उनके वंशज। बहुत कम समय बचा है अब मेरे पास। अब तो बस पछता रही हूँ यहाँ आ कर और बस लौट जाना चाहती हूँ, वापस अपने "मायके", परम-पिता ब्रह्मा के पास, उनके कमण्डल में, अपने घर।

"अपना घर...!!!"
सच-मुच बावरी हूँ मैं...!!!