सोमवार, 19 अगस्त 2013

गंगा की आत्म-व्यथा

मैं,
गंगा!!!

वही गंगा, जिसे आप देवनदी कहते हैं, देवी मानते हैं, "माँ" कह कर पुकारते हैं, जो आपके अनुसार भागीरथ के तपस्या से प्रसन्न ब्रह्मा के वरदान-स्वरूप उनके कमण्डल से निकली, विष्णु के चरणों को स्पर्श करते हुए रूद्र की जटाओं में भी स्थान पाया और पृथ्वी पर आकर 60,000 सागर-पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया।

पर छोड़िये भी, मैं भी क्या आप-लोगों के समक्ष भूली-बिसरी यादों को पुनः संजोने लगी। क्या करूँ, थोड़ी बावरी जो हूँ!!! सही सुना, बावरी ही हूँ; या यूँ कहें की बावरी हो गयी हूँ।

जिस देश को मैंने उसकी सभ्यता-संस्कृति और परम्पराएं दीं, जहाँ की आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक आस्था का आधार रही हूँ, जहाँ की सारी स्मृतियाँ, आशाएँ, ज्ञान-विज्ञान पराजय की पीड़ा और ऐसी ही ना जाने कितनी चीज़ें मुझसे लिपटी हैं; उसी देश में, उन्ही आज मुझे भुला दिया है, मुझे तिरस्कृत कर दिया है, वह भी अपने ही घर में...

ओह! ये क्या कहा मैंने अभी?
"अपना घर...!!!"

सच-मुच बावरी ही हो गयी हूँ।
सच है की इस देश में नारियों की उनके ससुराल में होने वाली क़द्र और पूछ सिर्फ चार दिनों की चाँदनी ही होती है, फिर उन्हें मिलता है तो सिर्फ तिरस्कार, दमन और शोषण ही... और इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं।

ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हो रहा है। क्या करूँ! जाती से "औरत" जो हूँ... सहना तो पड़ेगा ही। पर कब तक सहूँ... और सहूँ भी तो किसके लिए?

मैंने वह समय भी देखा है जब मेरे भागीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए, उनके द्वारा किये गए प्रण को स्वीकारते हुए मुझे पृथ्वी पर अवतरित कराने के लिए ऐसी घोर तपस्या की, जिसे उनके प्रयास के लिए आप लोगों को "भागीरथ-प्रयास" का नाम देना पड़ा।

और एक समय मैं वर्तमान का भी देख रही हूँ, जब उसी भागीरथ के वंशजों ने उस प्रण और प्रयास को धूमिल कर दिया है।

पर अब सब व्यर्थ है। बहुत रुष्ट हूँ मैं इस देश से और यहाँ के वासियों से भी। अब और नहीं रहूँगी यहाँ। कोई कारण ही नहीं बचा है। ना तो भागीरथ हैं, और ना ही उन जैसे उनके वंशज। बहुत कम समय बचा है अब मेरे पास। अब तो बस पछता रही हूँ यहाँ आ कर और बस लौट जाना चाहती हूँ, वापस अपने "मायके", परम-पिता ब्रह्मा के पास, उनके कमण्डल में, अपने घर।

"अपना घर...!!!"
सच-मुच बावरी हूँ मैं...!!!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें