मंगलवार, 20 अगस्त 2013

तुलसीदास जी के दोहे की भ्रामकता

महाकवि तुलसीदास
"सूर सूर, तुलसी शशि, उड़ुगन केशवदास…"
साहित्य-आकाश के 'चन्द्रमा' तुलसीदास को वर्तमान पीढी ने जितना गलत समझा है, उतना शायद उनके समकालीन किसी कवि को नहीं समझा गया।

तुलसी के एक दोहे का गाहे-बगाहे लोग अज्ञानतावश गलत सन्दर्भ में प्रयोग करते रहते हैं -

"ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥"

ख़ेद के साथ कहना चाहुँगा कि तुलसी के इस एक दोहे को गलत सन्दर्भ में उधृत करने वाले अधिकाँश लोगों को इनका कोई अन्य दोहा याद भी होगा, इसमें भी संशय होता है मुझे। और अगर पढा भी होगा तो शायद ठीक से समझा नहीं। मेरे इस आलेख का मक़सद तुलसी के इसी दोहे की भ्रामकता को दूर करना है।

दोस्तों, तुलसी एक महाकवि हैं, और "महाकवि" की उपाधी उन्होंने अपने साहित्य की गुणवत्ता के ज़रिये अर्जित की है, उन्हें किसी ने भीख में ये उपाधी नहीं दी है।

सन्दर्भ में जानक़ारी देना चाहुँगा कि साहित्य की दो मुख्य विधायें हैं- गद्य और पद्य। गद्य जहाँ अपने विस्तार के लिये जाना जाता है, वहीं पद्य अपने अलँकार के लिये। पद्य में अलँकारों और उपमाओं की बहुलता होती है, जिनका अपना गूढ अर्थ होता है। इन्हें समझने के लिये विस्तृत दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। महज़ सतही आकलन से इन रचनाओं की सार्थकता समझ में नहीं आती।

गद्य यानी कहानियाँ, फ़िल्मों के पोस्टर और अन्य चित्रों की तरह होती हैं, जिन्हें कोई भी समझ सकता है; जबकि पद्य यानी काव्य मौडर्न-आर्ट की तरह हैं, जिन्हें समझने के लिये दृष्टिकोण का विस्तार चाहिये। कथ्य की इसी जटिलता के कारण ही सम्भवतः कहानियों के रसिया ज्यादा मिलते हैं, किन्तु काव्य में रुचि रखने वाले कम।

सन्दर्भ में शुरुआत मैं "ढोल" से करना चाहुँगा। संगीत में दो अहम चीज़ें होती हैं- सुर और ताल। जब तबले का प्रचलन नहीं था, तब ताल देने के लिये ढोल का प्रयोग किया जाता था। ताल अगर बिगड़ जाती है तो सुर भी बिगड़ जाता है और संगीत का सत्यानाश हो जाता है। तो ढोलक की ताल को सही बनाये रखने के लिये उसमें लगे रस्से और छल्लों की मदद से उसे "कसा" जाता है, अनुशासित किया जाता है। इसी "कसने" और "अनुशासित करने" की प्रक्रिया को तुलसी ने "ताड़न" कहा है। अज्ञानतावश हम तुलसी के "ताड़न"को मारना-पीटना और प्रताड़ित करना समझ लेते हैं।

प्रसंग में आचार्य चाणक्य के एक श्लोक को रखना चाहुँगा-

"लालयेत् पञ्चवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत्, प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत्!"

- चाणक्य नीति


(Indulge a child for the first 5 years; discipline him for the next 10; when he attains the age of 16, treat him like a friend.)

यहाँ चाणक्य के कथन का ये अर्थ कदापि नहीं है कि 10 वर्ष तक पुत्र को हर वक़्त मारते-पीटते रहें! बल्कि वो उसे अनुशासित करने, उसे "कसने" पर ज़ोर देते हैं, क्योंकि ये वो अवस्था है जब बालक कच्ची मिट्टी का होता है। इस समय जैसे संस्कारों का उसमें बीजारोपण होगा, वह पूरे जीवन रहेगा।

तो दोस्तों, तुलसी के "ताड़न" को भी इसी सन्दर्भ में देखने की जरूरत है। अब ज़रा इस नये सन्दर्भ के आलोक में तुलसी के कथन को फ़िर से देखिये।

"ढोल" को अनुशासित करेंगे, तो संगीत की सुन्दरता बढेगी। "गँवार" को अनुशासित बनायेंगे, तो समाज़ की सुन्दरता बढेगी। "शूद्र" को अनुशासित और विकसित बनायेंगे, तो वो समाज़ की मुख्य-धारा में शामिल हो पायेंगे और राष्ट्र विकसित होगा। "पशु-धन" को अनुशासित और विकसित बनायेंगे, तो कृषि और आजीविका का विकास होगा। "स्त्री" अनुशासित होगी, तो परिवार सुसंस्कृत और विकसित होगा।

यही कारण है कि ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी को अनुशासित करने की आवश्यकता है। समाज़ को इतना महान सूत्र देने वाले तुलसी के इस कथन को ठीक उलटा अर्थ दे दिया गया है!

मत भूलें कि जिस तुलसी के नायक "राम" हैं, वह इतनी निम्न सोच कैसे रख सकते हैं! वह राम, जिनका जन्म ही "सद-रक्षणाय, खल-निग्रहणाय" हुआ… वह राम, जिन्होंने शबरी के जूठे बेर खा कर जाति-प्रथा पर कठोर प्रहार किया… वह राम, जिनके सबसे प्रिय हनुमान एक वानर थे!

मत भूलें कि रामबोला को तुलसी उनकी पत्नी ने बनाया… एक स्त्री ने।

"लाज न लागत आपको, दौरे आयहु साथ। धिक-धिक ऐसे प्रेम को कहाँ कहहुं मे नाथ॥

अस्थि चर्ममय देह मम, तामे ऐसी प्रीती। तैसी जो श्रीराम मे, छेती न तो भव भीती॥"


लेकिन अफ़सोस! जो पीढी राम को ही ना समझ सकी, जो पीढी रावण में अपना नायक देखती है; वह पीढी अगर तुलसी को ना समझ सकी तो आश्चर्य कैसा!

सन्दर्भ में और कहना चाहुँगा। जाति-पाती के प्रश्न पर तुलसी ने चिढ कर "कवितावली" में अपने अन्दर का आक्रोश इन पँक्तियों में व्यक्त किया है :-

"धूत कहौ अवधूत कहौ रजपूत कहौ जोलहा कहौ कोऊ काहू की बेटी सों बेटा न व्याहब, काहू की जाति बिगारी न सोऊ।''

पुन:,

"मेरे जाति-पांति न चहौं काहू का जाति-पांति, मेरे कोऊ काम को न मैं काहू के काम को।''
रावण में अपना नायक देखती है; वह पीढी अगर तुलसी को ना समझ सकी तो आश्चर्य कैसा!

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विश्वास आनंद

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